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| शेयर बाजार में 8 हफ्तों की ऐतिहासिक गिरावट, ₹26 लाख करोड़ साफ! FII बिकवाली से सेंसेक्स-निफ्टी पर क्यों बढ़ा दबाव? |
शेयर बाजार में 8 हफ्तों की ऐतिहासिक गिरावट, ₹26 लाख करोड़ साफ! FII बिकवाली से सेंसेक्स-निफ्टी पर क्यों बढ़ा दबाव?
भारतीय शेयर बाजार में निवेशकों की चिंता लगातार बढ़ रही है। सेंसेक्स और निफ्टी में आठ सप्ताह से जारी कमजोरी ने बाजार के लंबे गिरावट वाले दौर की ओर ध्यान खींचा है। इस अवधि में निवेशकों की संपत्ति में करीब 26 लाख करोड़ रुपये की कमी आई है। आखिर बाजार पर इतना दबाव क्यों है और आगे कौन से संकेत अहम होंगे, इसे समझते हैं।
25 साल में सबसे लंबा गिरावट का दौर
भारतीय इक्विटी मार्केट के लिए लगातार आठ सप्ताह की गिरावट एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, यह दौर 2020 के कोविड-19 बाजार संकट और 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान देखी गई लगातार गिरावट से भी लंबा है।
आठ सप्ताह में निफ्टी लगभग 8.7 प्रतिशत और सेंसेक्स करीब 8.4 प्रतिशत नीचे आया है। सेंसेक्स में इस दौरान करीब 6,590 अंकों की गिरावट हुई, जबकि निफ्टी लगभग 2,149 अंक टूट गया।
बीएसई पर सूचीबद्ध कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण भी इस दौरान 26 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा घटकर 467 लाख करोड़ रुपये से नीचे आ गया।
एक सप्ताह में भी तेज बिकवाली
गिरावट सिर्फ लंबी अवधि तक सीमित नहीं रही। हालिया सप्ताह में निफ्टी लगभग 3.1 प्रतिशत और सेंसेक्स करीब 2.7 प्रतिशत नीचे आया। सितंबर महीने में भी दोनों प्रमुख सूचकांकों में लगभग 6 प्रतिशत की कमजोरी दर्ज की गई।
1 अक्टूबर को सेंसेक्स 570 अंक टूटकर 71,909 के स्तर पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 198 अंक गिरकर 22,421 पर आ गया। 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के कारण घरेलू शेयर बाजार में कारोबार नहीं हुआ।
FII की भारी बिकवाली बनी बड़ी चिंता
बाजार में दबाव बढ़ाने वाले प्रमुख कारणों में विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार बिकवाली शामिल है। 1 अक्टूबर को FII ने भारतीय शेयरों में लगभग 9,484 करोड़ रुपये की शुद्ध बिकवाली की। इससे पिछले चार कारोबारी सत्रों में उनकी कुल बिकवाली करीब 34,965 करोड़ रुपये पहुंच गई।
दूसरी तरफ घरेलू संस्थागत निवेशकों ने बाजार को संभालने का प्रयास किया। 1 अक्टूबर को DII की खरीदारी लगभग 10,042 करोड़ रुपये रही। सितंबर में भी विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की इक्विटी बिकवाली करीब 46 हजार करोड़ रुपये बताई गई।
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड से क्यों बढ़ा दबाव?
विदेशी निवेशकों के रुख पर वैश्विक बॉन्ड मार्केट का भी असर पड़ रहा है। अमेरिकी 10 वर्षीय ट्रेजरी यील्ड में तेज बढ़ोतरी ने निवेशकों का ध्यान आकर्षित किया है। जब अमेरिकी बॉन्ड से मिलने वाला संभावित रिटर्न बढ़ता है, तो वैश्विक निवेशकों के लिए अपेक्षाकृत सुरक्षित डेट एसेट अधिक आकर्षक हो सकते हैं।
इसका असर उभरते बाजारों से पूंजी के प्रवाह पर पड़ सकता है और भारत जैसे बाजारों में विदेशी निवेश पर दबाव बढ़ सकता है।
महंगा कच्चा तेल और कमजोर रुपया
भारतीय शेयर बाजार के लिए कच्चे तेल की कीमत भी अहम चिंता है। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। इसलिए क्रूड की कीमत बढ़ने पर आयात बिल, महंगाई और चालू खाते पर दबाव बढ़ सकता है। 1 अक्टूबर को ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रहा।
इसके साथ रुपये की कमजोरी ने भी बाजार की चिंता बढ़ाई। 1 अक्टूबर को रुपया करीब 0.5 प्रतिशत कमजोर होकर 96.31 रुपये प्रति डॉलर पर बंद हुआ, जो लगभग दो महीने का निचला स्तर था।
आगे किन संकेतों पर रहेगी नजर?
आने वाले कारोबारी सत्रों में बाजार की दिशा समझने के लिए FII की बिकवाली, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, कच्चे तेल की कीमत और रुपये की चाल महत्वपूर्ण रहेंगी। यदि इन वैश्विक संकेतकों में बड़ा बदलाव आता है, तो भारतीय इक्विटी बाजार की धारणा पर भी उसका असर दिखाई दे सकता है।
हालांकि, किसी भी निवेश निर्णय से पहले बाजार की मौजूदा परिस्थितियों, कंपनी के फंडामेंटल और अपने जोखिम स्तर का स्वतंत्र रूप से आकलन करना जरूरी है।
Disclaimer
यह लेख केवल सामान्य जानकारी और बाजार संबंधी डेटा की समझ के उद्देश्य से है। इसे निवेश, शेयर खरीदने या बेचने की व्यक्तिगत सलाह न माना जाए। निवेश से पहले योग्य वित्तीय सलाहकार से सलाह लें और बाजार जोखिमों को समझकर ही निर्णय लें।

